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Deepthi Vasan

Deepthi Vasan Facebook ad: “मेरे ऑर्थोपेडिक सर्जन ने पूछा कि मैंने इंजेक्शन…”

Deepthi Vasan Facebook ad: मेरे ऑर्थोपेडिक सर्जन ने पूछा कि मैंने इंजेक्शन…

Ran for 68 days, from April 15 to June 22, 2026, the last day Crush saw it.

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Facebook, Instagram, Audience Network, Messenger and Threads
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मेरे ऑर्थोपेडिक सर्जन ने पूछा कि मैंने इंजेक्शन की अपॉइंटमेंट क्यों कैंसल कर दी। जब मैंने उन्हें बताया कि रात को सोने से पहले सिर्फ 15 मिनट की एक आदत ने मेरी सुबह की एड़ी का दर्द पूरा खत्म कर दिया, तो उन्होंने अपनी जेब से नोटपैड निकाला और लिखने लगे। मुझे ये उम्मीद नहीं थी। उस इंजेक्शन के नाम से ही मेरी जान निकलती थी। बिल्डिंग की हर आंटी के पास एक डरावनी कहानी थी। "एड़ी की हड्डी बिस्किट जैसी हो जाती है।" "छह महीने बाद दर्द दोगुना लौटता है।" "मेरी पड़ोसन को तीन इंजेक्शन लगे, फिर भी आखिर में सर्जरी करानी पड़ी।" लेकिन पहले शुरू से बताती हूँ। ======== मेरी उम्र 42 साल है। पुणे में रहती हूँ — पति, सास और दो बच्चों के साथ। 22 साल से ये घर मेरे कंधों पर है। सबसे पहले उठो। सबसे आखिर में बैठो। करीब चौदह महीने पहले मुझे बाईं एड़ी में हल्का सा दर्द महसूस होने लगा। तेज नहीं था। बस देर तक खड़े रहने पर एक थकान जैसी टीस। मैंने नज़रअंदाज़ कर दिया। और करती भी क्या? खाना तो अपने आप नहीं बनता। लेकिन दो महीने में वो हल्की सी टीस कुछ और ही बन गई। हर सुबह जैसे ही पैर ज़मीन पर रखती, लगता था कोई गरम सुई एड़ी में घुसा रहा है। पलंग का कोना पकड़कर खड़ी होती। दर्द कम होने का इंतज़ार करती। फिर लंगड़ाते हुए बाथरूम तक जाती। सासूमा ने ध्यान देना शुरू किया। "ऐसे क्यों चल रही हो?" "बस बदन दर्द है," मैं कहती। "थोड़ी देर में ठीक हो जाता है।" लेकिन ठीक नहीं हुआ। बढ़ता ही गया। चौथे महीने तक मैंने खाना बनाते वक़्त टाइमर लगाना शुरू कर दिया। बीस मिनट खड़ी रहो, फिर बैठना पड़ता था। एड़ी में जलन शुरू होती, फिर पिंडली तक चढ़ती, फिर कमर तक पहुँच जाती। त्योहारों से डर लगने लगा। नवरात्रि आई तो एक आरती में भी खड़ी नहीं रह पाई। बाकी सब औरतें खड़ी थीं, मैं कोने में बैठी थी। सासूमा ने जो नज़र से देखा, वो आज तक नहीं भूली। मैं बूढ़ी औरत जैसा महसूस कर रही थी। 42 की उम्र में लगता था 60 की हो गई हूँ। ======== तब जाकर डॉक्टर के पास गई। एक्स-रे लिया। एड़ी दबाकर देखी। कमरे में चलवाया। "हील स्पर है," उन्होंने कहा। "और प्लांटर फेशिआइटिस। आपकी उम्र में बहुत कॉमन है। वज़न कम करो, MCR चप्पल पहनो, स्ट्रेचिंग करो।" तो मैंने वही किया। MCR चप्पल ख़रीदी। ऑर्थोपेडिक दुकान से "अच्छी वाली" — ₹1,200 की। दिन में थोड़ा आराम मिलता था। लेकिन सुबह? वही चुभने वाला दर्द। वही लंगड़ाना। स्ट्रेचिंग एक्सरसाइज़ भी कीं। दीवार के सहारे काफ स्ट्रेच। बिस्तर पर तौलिये से पैर खींचना। दस मिनट आराम मिलता। फिर खाना बनाना शुरू करते ही दर्द लौट आता। रात को गरम पानी में पैर डुबोए। सरसों के तेल से मालिश की। पड़ोसन की कज़िन ने केरल से कोई आयुर्वेदिक बाम भिजवाया था — उसने कसम खाई थी कि कमाल करता है। वो भी लगाया। कुछ काम नहीं आया। सुबह का दर्द जस का तस। ======== चार महीने और गुज़ारे, फिर दोबारा डॉक्टर के पास गई। उन्होंने फ़िज़ियोथेरेपिस्ट के पास भेजा। आठ सेशन। ₹800 प्रति सेशन। कुल ₹6,400। फ़िज़ियोथेरेपिस्ट अच्छी थीं। एक्सरसाइज़ सिखाईं, अल्ट्रासाउंड थेरेपी की, पैर पर टेप लगाया। हर सेशन के बाद दो-तीन दिन अच्छा लगता। फिर दर्द वापस। "आपको एक्सरसाइज़ रेगुलर करनी होगी," उन्होंने कहा। लेकिन करती कब? पूरा घर चलाना था। रात को सब खा-पीकर बैठ जाते, तब तक मेरी खड़े होने की ताक़त ही नहीं बचती थी — एक्सरसाइज़ तो दूर की बात। ======== फ़िज़ियोथेरेपी से भी कुछ न हुआ तो दर्द की गोलियों पर आ गई। पहले पैरासिटामॉल। फिर जब वो काम करना बंद कर दी, तो इबुप्रोफ़ेन। सुबह नाश्ते से पहले दो गोली — बस इतना ही सहारा था। दोपहर तक दो और। पेट जलने लगा। एसिडिटी शुरू हो गई। एक दर्द मिटाने के चक्कर में दूसरा पैदा कर लिया। तभी पति ने कहा — बस। "वापस जाओ डॉक्टर के पास। बोलो कि कुछ काम नहीं आ रहा।" तो गई। ======== डॉक्टर ने फिर से एड़ी देखी। पुरानी एक्स-रे रिपोर्ट्स पलटीं। होंठ भींचे। "कंज़र्वेटिव ट्रीटमेंट काम नहीं कर रहा," उन्होंने कहा। "मुझे लगता है अब स्टेरॉयड इंजेक्शन देना चाहिए। आराम मिलेगा।" दिल डूब गया। बहुत कहानियाँ सुनी थीं। इंजेक्शन जो तीन महीने काम करता है, फिर बंद। एड़ी का गद्दा पतला हो जाता है। औरतें जिन्हें एक के बाद एक इंजेक्शन लगा, और आखिर में सर्जरी करानी ही पड़ी। "क्या कुछ और ट्राई कर सकती हूँ पहले?" मैंने पूछा। उन्होंने सिर हिलाया। "इस स्टेज पर इंजेक्शन ही अगला स्टेप है। अगले महीने का अपॉइंटमेंट ले लीजिए।" क्लिनिक से निकलकर गाड़ी में बैठकर रोई। ======== उस रात नींद नहीं आई। रात 2:30 बजे बिस्तर पर बैठी गूगल कर रही थी — "heel pain injection side effects" और "how to avoid heel spur surgery." एक के बाद एक डरावने अनुभव पढ़े। फिर कुछ अलग मिला। दिल्ली की एक फ़िज़ियोथेरेपिस्ट का वीडियो था जिसमें उन्होंने बताया कि सुबह का एड़ी का दर्द सबसे ज़्यादा क्यों होता है। आठ घंटे आराम करने के बाद, जब दर्द सबसे कम होना चाहिए, तब सबसे ज़्यादा क्यों होता है? उनकी बात ने सब बदल दिया। ======== उन्होंने कहा: "सोते वक़्त आपका शरीर ख़ुद को ठीक करता है। प्लांटर फेशिया — यानी एड़ी के नीचे की मोटी पट्टी — उसमें जो छोटे-छोटे कट लगते हैं, शरीर उन्हें कोलेजन फ़ाइबर भेजकर जोड़ता है।" "ये अच्छी बात है। लेकिन एक दिक्कत है।" "जब आप सोती हैं, तो पैर नीचे की तरफ़ झुका रहता है। बैलेरीना की तरह। इस पोज़ीशन में प्लांटर फेशिया सिकुड़ी हुई रहती है। छोटी और टाइट।" "तो शरीर उन कटों को सिकुड़ी हुई हालत में जोड़ता है। पूरी रात, घंटे दर घंटे, वो पट्टी सिमटी हुई पोज़ीशन में रिपेयर होती रहती है।" "फिर सुबह होती है। आप पैर ज़मीन पर रखती हैं। और रातभर की सारी मरम्मत एक झटके में टूट जाती है।" "क्योंकि फेशिया छोटी होकर जुड़ी थी। और अब आप उसे अचानक लंबा खींच रही हैं।" मैंने वो हिस्सा तीन बार देखा। यही है वो सुई चुभने वाला दर्द। यही है वो "कीलों के बिस्तर" जैसा एहसास। ये सिर्फ़ सूजन नहीं है। सिर्फ़ अकड़न नहीं है। ये आपके अपने शरीर की हीलिंग है जो हर सुबह टूट जाती है। ======== और अचानक मुझे समझ आया कि अब तक कुछ क्यों काम नहीं किया। MCR चप्पल सिर्फ़ दिन में मदद करती है। सोते वक़्त उसका कोई फ़ायदा नहीं। स्ट्रेचिंग थोड़ी देर का आराम देती है, लेकिन रात को फेशिया को सिकुड़ने से नहीं रोकती। दर्द की गोलियाँ दर्द छुपाती हैं, लेकिन वो सुबह वाला टूटना नहीं रुकता। फ़िज़ियोथेरेपी मदद करती है, लेकिन रात की नुक़सानी रोज़ सब बर्बाद कर देती है। किसी भी चीज़ ने वो नहीं किया जो सोते वक़्त होना चाहिए था। ======== उस वीडियो में आगे उपाय भी बताया। अगर रात को सोते वक़्त फेशिया को हल्के से खिंची हुई हालत में रखो, तो कोलेजन फ़ाइबर लंबी पोज़ीशन में जुड़ते हैं। पट्टी लंबी होकर ठीक होती है, छोटी होकर नहीं। तो सुबह जब पैर ज़मीन पर पड़ता है, तो कुछ टूटता ही नहीं। उन्होंने बताया कि एक ख़ास तरह की कम्प्रेशन स्लीव होती है — जिसमें 15 से 25 mmHg प्रेशर होता है। इतना कि पैर हल्के से मुड़ा रहे, लेकिन इतना नहीं कि ख़ून का बहाव रुके। मैंने कभी ये नहीं सुना था। घंटों रिसर्च किया। एक कंपनी मिली — Restep — जो बिल्कुल यही बनाती है। ग्रैजुएटेड कम्प्रेशन फ़ुट स्लीव, ख़ासतौर पर प्लांटर फेशिआइटिस के लिए। प्रेशर लेवल सही था। रिव्यूज़ में बिल्कुल मेरे जैसी औरतें अपनी कहानी बता रही थीं। रात 3:45 बजे ऑर्डर कर दिया। किसी को नहीं बताया। पहले ही बहुत पैसे बर्बाद हो चुके थे। "और एक बेकार चीज़" सुनने का मन नहीं था। ======== जब आया, उसी रात सोने से पहले पहन लिया। शुरू में अजीब लगा। पैर और टखने पर हल्का सा दबाव। तकलीफ़ नहीं। बस अलग सा। रात नॉर्मल सोई। अगली सुबह उठी। बिस्तर के किनारे बैठी। साँस ली। पैर ज़मीन पर रखे। दर्द था। लेकिन अलग। कम तेज़। जैसे गरम सुई की जगह किसी ने अंगूठे से दबा दिया हो। सोचा शायद इत्तेफ़ाक़ है। लेकिन अगली सुबह भी वही। कम तेज़। पाँचवें दिन मैं बिना पलंग का कोना पकड़े खड़ी हो गई। पता ही नहीं चला — जब तक चलने नहीं लगी। पहले हफ़्ते के आख़िर तक मैं बिना लंगड़ाए किचन तक पहुँच गई। चाय बनाते-बनाते रोने लगी। बेटी दौड़ती आई — सोचा कुछ हो गया। "कुछ नहीं हुआ," मैंने कहा। "मैं ठीक हूँ। इसीलिए रो रही हूँ।" दूसरे हफ़्ते से खाना बनाते वक़्त टाइमर लगाना बंद कर दिया। पूरे घर का खाना बनाया — एक बार भी नहीं बैठी। तीसरे हफ़्ते नवरात्रि शुरू हुई। पूरी आरती खड़े होकर की। सासूमा ने इस बार अलग नज़र से देखा। "एड़ी ठीक हो गई?" "हाँ," मैंने कहा। "आख़िरकार।" ======== छठे हफ़्ते मैंने इंजेक्शन की अपॉइंटमेंट कैंसल कर दी। रिसेप्शनिस्ट ने पूछा क्यों। "अब ज़रूरत नहीं।" दो हफ़्ते बाद चेक-अप के लिए ऑर्थोपेडिक सर्जन के पास गई। उन्होंने एड़ी दबाई। चलवाया। चेहरे पर हैरानी थी। "दर्द सच में गया?" "लगभग पूरा। कई दिन तो याद भी नहीं आता कि कभी दिक्कत थी।" "क्या किया आपने?" मैंने उन्हें पूरी बात बताई। रात वाली हीलिंग की दिक्कत। फेशिया सिकुड़ी हालत में कैसे जुड़ती है। कम्प्रेशन स्लीव कैसे उसे खिंची हुई रखती है ताकि टिशू सही पोज़ीशन में ठीक हो। उन्होंने ग़ौर से सुना। फिर नोटपैड निकाला। "क्या नाम है इसका?" "Restep।" उन्होंने लिख लिया। "बायोमेकैनिकली ये सही बात है," उन्होंने कहा। "काश ज़्यादा मरीज़ इंजेक्शन से पहले ये ट्राई करतीं।" ======== ये बात चार महीने पहले की है। जितनी भी जानने वाली औरतों को एड़ी का दर्द है, सबको बताया। भाभी ने ऑर्डर किया — मुझे एक साल से तड़पते देखा था। नौ दिन बाद मैसेज आया: "आज पूरी पूजा खड़े होकर की।" वही पड़ोसन जो इंजेक्शन के बारे में डराती थी — उसने भी ट्राई किया। दो महीने से उसे कोई दर्द नहीं। मैं आज भी हर रात Restep स्लीव पहनकर सोती हूँ। पहनने में पंद्रह सेकंड लगते हैं। अब सोचती भी नहीं हूँ। और यही तो बात है। अब मैं अपने पैरों के बारे में सोचती ही नहीं। चौदह महीने तक, सुबह उठते ही सबसे पहले एड़ी का ख़्याल आता था और रात को सोते वक़्त सबसे आख़िर में। अब बस जीती हूँ। खाना बनाती हूँ, जॉगिंग करती हूँ, पूजा में खड़ी रहती हूँ, बाज़ार में घूमती हूँ। मेरे पैर मुझे उठाते हैं। जैसा उन्हें करना चाहिए। ======== अगर तुम ये रात के 2 बजे पढ़ रही हो, इंजेक्शन से डरी हुई, कुछ ढूँढ रही हो जो सच में काम करे — मैं समझती हूँ। तुम्हारा दर्द असली है। तुम ड्रामा नहीं कर रही। ये सिर्फ़ उम्र नहीं है। सिर्फ़ वज़न नहीं है। तुम्हारा शरीर हर रात ख़ुद को ठीक करने की कोशिश कर रहा है। बस उसे सही पोज़ीशन में ठीक होने में मदद चाहिए। Restep की 30 दिन की मनी-बैक गारंटी है। ट्राई करो और ख़ुद देखो। मुझे इसे शेयर करने से कुछ नहीं मिल रहा। मैं बस जानती हूँ कैसा लगता है — अपने ही घर में लंगड़ाना, वक़्त से पहले बूढ़ा महसूस करना, सोचना कि क्या कभी नॉर्मल चल भी पाऊँगी। चल पाओगी। तुम्हारे पैरों ने सालों तक पूरे घर का बोझ उठाया है। अब उन्हें भी थोड़ा सहारा मिलना चाहिए। update: बहुत सारी लोगों ने मुझे प्रोडक्ट का लिंक माँगा है, नीचे दे रही हूँ https://www.restep.in/products/restep-biowrap-sleeves-2

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