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Nitin Tripathi

Nitin Tripathi Facebook ad: “MP वाक़ई मलंग है.”

Nitin Tripathi Facebook ad: MP वाक़ई मलंग है.

Ran for 215 days, from November 26, 2025 to June 29, 2026, the last day Crush saw it.

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MP वाक़ई मलंग है. जबलपुर प्रातः छः बजे पहुँचे. वहाँ से माँ त्रिपुर सुंदरी के दर्शन के लिए पहुँचे. बहुत दिव्य माहौल था. समस्या यह कि मंदिर खुलता है आठ बजे और हम साढ़े छह बजे ही पहुँच गए थे. प्रांगण में ढेरों प्रसाद की दुकानें हैं ज्यादातर दुकानें बंद थीं, एक दुकान आधी खुली थी बाहर एक बाबा जी आग ताप रहे थे. प्रायः नए शहर में जाइए तो एक संदेह रहता है. प्रसाद, कमल के फूल, लौंग की माला इत्यादि लिया - जितनी उम्मीद थी उससे आधे पैसों में प्रसाद आ गया. मंदिर बंद था सोचा इंतज़ार करते हैं. एक सज्जन बाहर टहल रहे थे, पता लगा मंदिर के मैनेजर हैं. मंदिर के मुख्य द्वार के साइड में उनका ऑफिस था, उन्होंने अपना ऑफिस खोल दिया कि इधर से अंदर चले जाइए. मन की मुराद पूरी हो गई. सोचा इस विशाल मंदिर के अंदर अकेले बैठ कर टाइम पास करेंगे डेढ़ दो घंटे जब तक गर्भ ग्रह नहीं खुलता. तभी पुजारी जी आए बताने लगे प्रातः देवी माता का श्रृंगार होता है, वह गर्भ ग्रह खोल दे रहे हैं हम दर्शन कर सकते हैं. बिल्कुल वीआईपी फील आया, विशाल गर्भ ग्रह जहाँ दिन के समय धक्का मुक्की लाइन लगी रहती है, बिल्कुल शांत अकेले दर्शन, बैठ कर ध्यान और पूजन का मौक़ा मिल जाये क्या चाहिए. इसी बीच पुजारी जी ने मूर्ति क्षेत्र का दरवाजा भी खोल दिया और पत्नी से बोला कि वह चाहें तो माता को स्नान करा सकती हैं. ऐसा मौक़ा सामान्यतः आसानी से नहीं मिलता है. पुजारी जी ने हमारी पूजन सामग्री रख ली बोला श्रृंगार के पश्चात माला आदि पहना देंगे. चलते वक्त मैं प्रायः पुजारी जी को दक्षिणा अवश्य देता हूँ, और यहाँ तो पुजारी जी ने इतने अच्छे दर्शन कराये थे. उन्हें दक्षिणा दी बाद में देखा उन्होंने यह दक्षिणा मंदिर की हुंडी में डाल दी. बाहर निकले एक सफ़ाई कर्मी मंदिर साफ़ कर रहा था, उसे भी कुछ पैसे दिए. थोड़े समय वहीं बैठा रहा, देखा सफ़ाई कर्मी सफाई के पश्चात माता की मूर्ति के समक्ष नतमस्तक हुआ और जो पैसे मैंने उसे दिए थे वह उसने पूरे चढ़ा दिए. बाहर निकले साढ़े सात बज चुके थे, थोड़ी चहल पहल थी. जहाँ से प्रसाद लिया था बाबा जी ने बुलाया. ऐसे केस में मन प्रायः सशंकित हो जाता है कि यह कुछ बेचने की कोशिश करेंगे. गए तो उन्होंने माता की एक फ़ोटो दी कि इसे अपने मंदिर में रख लेना. मैंने पूछा कितने पैसे हुवे उत्तर मिला यह उनकी ओर से आशीर्वाद है. जाहिर सी बात है ऐसा आशीर्वाद मिले तो मन प्रफुल्लित हो ही जाता है. सभी ने दिल जीत लिया. मैनेजर हों या सफाई कर्मी या प्रसाद वाला या पुजारी जी सभी दिल से माता की सेवा में समर्पित दिखे, भक्ति भावना दिखी. अन्यथा अब तो टूरिस्टी कल्चर हो गया है भक्ति से ज्यादा व्यापार की भावना दिखती है प्रायः. यही छोटे छोटे अनुभव हैं जिन्हे आप जब याद करें चेहरे पर मुस्कान आ जाती है.

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